पर्यटक स्थल फ़िल्टर: सब अन्य एडवेंचर ऐतिहासिक ...
Posts
कनकोड़ा का आंदोलन रुद्रप्रयाग चमोली उत्तराखंड गढ़वाल
- Get link
- X
- Other Apps
Skip to content Breaking Uttarakhand Breaking News Uttarakhand सौ साल पहले गढ़केशरी के नेतृत्व में ककोड़ा खाल बर्दायस आन्दोलन ने हिला दी थी ब्रितानियों की चूलें सौ साल पहले गढ़केशरी के नेतृत्व में ककोड़ा खाल बर्दायस आन्दोलन ने उखाड़ दी थी ब्रितानियों की जड़ें आपने कहावत सुनी होगी ‘ये कार्य मेरे बर्दाश्त के बाहर है’ बर्दायस शब्द वही है। दूसरी कहावत सुनी होगी अजी हम तो बेगार कर रहे हैं। इसका तात्पर्य है विवशता के चलते बिना पैसों के उपरी आदेश पर काम करना। आपने कहावत सुनी होगी ‘पटवारी से बड़ा उसका चाकर’। शासकीय कार्यों में घूस रिश्वत और आजकल सुविधा शुल्क का राज इस वाक्य में छुपा है। आपने एक और कहावत और सुनी होगी ‘कहां रह गया नीति कहां रह गया माणा श्याम सिंह पटवारी ने कहां-कहां जाणा’ उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की परिस्थितियों की पीड़ा इस कहावत में छिपी है। उत्तराखंड में अंग्रेजी राज से पहले के दौर में केदारखंड और मानसखंड के राजवाड़े बड़े भड़ पराक्रमी होने के उपरांत भी म्लेच्छ और गोर्खा दुश्मनों की डर के कारण न तो ठीकठाक मार्ग बनवाते थे ना नदियों में पक्का...
- Get link
- X
- Other Apps
चिपको आंदोलन - गौरा देवी और पर्यावरण गौरा देवी का जन्म 1924 में उत्तराखंड के लाता गाँव में हुआ था। इन्हें चिपको आन्दोलन की जननी माना जाता है। गौरा की शादी मात्र 12 वर्ष की उम्र में मेहरबान सिंह के साथ कर दी गई थी, जो कि अलकनंदा नदी के किनारे बसे, उनके नज़दीकी गाँव रैणी के निवासी थे। मेहरबान सिंह एक किसान थे और भेड़ों को पालकर उनकी ऊन का व्यापार किया करता थे, इन्हीं छोटे-मोटे कामों से उनका घर चलता था! लेकिन शादी के 10 वर्ष बाद ही मेहरबान सिंह की असमय मृत्यु हो गई और उसके बाद गौरा देवी को अपने बच्चे का लालन-पालन अकेले करना पड़ा और उन्हें काफी दिक्कतें आई लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी! कुछ समय बाद गौरा देवी को रैणी गाँव की महिला मंडल दल का अध्यक्ष बनाया गया और गाँव के चारों और की वन और भू सम्पत्ति की देखभाल का जिम्मा उन्हें दिया गया, उस वक़्त गाँव के चारों ओर बड़े-बड़े पेड़-पौधे थे जो कि पूरे क्षेत्र को घेरे हुए थे और चारों तरफ हरियाली थी। उस दौर में उत्तराखण्ड में वन सम्पत्ति और पेड़ों के कटान का बहुत अधिक चलन था और भारत सरकार ने भी वनों की रक्षा के लिए कोई सख़्त कानून...
जोंक के बारे में रोचक तथ्य
- Get link
- X
- Other Apps
जोंक से खून चूसने के फायदे By-Naveen ramola बरसात के मौसम में पहाड़ी इलाकों में जोंकें देखी जाती हैं. स्थानीय लोग तो इसके अभ्यस्त हो जाते हैं लेकिन मैदानी इलाकों से छुट्टियाँ बिताने पहाड़ आने वाले अप्रवासी और पर्यटक जोंकों से खौफ़जदा रहते हैं. नमी वाली जगहों में बहुतायत से पाई जाने वाली जोंकें कब आपके शरीर में चिपककर खून चूसने लगती हैं इसका पता नहीं चलता. जोंक के इस सफाई के साथ खून चूसने से खौफ़जदा लोग इसे शरीर से दूर रखने के लिए तमाम टोटके भी करते हैं. जुराबों में तम्बाकू भरने से लेकर नमक के पानी में पैर भिगोने तक. लेकिन बरसात में जोंक आपका पीछा नहीं छोडती. जोंक कब शरीर से चिपककर खून चूसती चली जाती है इसकी भनक तक न लगने के पीछे जिम्मेदार होता है इसकी लार में पाया जाना वाला एन्जाइम हीरूडीन. यही हीरूडीन खून को पतला भी करता है. हीरूडीन एन्जाइम ह्रदय रोगों की दावा में भी इस्तेमाल किया जाता है. यह रक्त का थक्का नहीं जमने देता. पतली सी जोंक जब खून चूसकर थुलथुल हो जाती है तब यह अपना ही भार सहन नहीं कर पाती और आपके शरीर से गिर जाते है. जो...