चिपको आंदोलन - गौरा देवी और पर्यावरण
गौरा देवी का जन्म 1924 में उत्तराखंड के लाता गाँव में हुआ था। इन्हें चिपको आन्दोलन की जननी माना जाता है।
गौरा की शादी मात्र 12 वर्ष की उम्र में मेहरबान सिंह के साथ कर दी गई थी, जो कि अलकनंदा नदी के किनारे बसे, उनके नज़दीकी गाँव रैणी के निवासी थे। मेहरबान सिंह एक किसान थे और भेड़ों को पालकर उनकी ऊन का व्यापार किया करता थे, इन्हीं छोटे-मोटे कामों से उनका घर चलता था!
लेकिन शादी के 10 वर्ष बाद ही मेहरबान सिंह की असमय मृत्यु हो गई और उसके बाद गौरा देवी को अपने बच्चे का लालन-पालन अकेले करना पड़ा और उन्हें काफी दिक्कतें आई लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी!
कुछ समय बाद गौरा देवी को रैणी गाँव की महिला मंडल दल का अध्यक्ष बनाया गया और गाँव के चारों और की वन और भू सम्पत्ति की देखभाल का जिम्मा उन्हें दिया गया, उस वक़्त गाँव के चारों ओर बड़े-बड़े पेड़-पौधे थे जो कि पूरे क्षेत्र को घेरे हुए थे और चारों तरफ हरियाली थी।
उस दौर में उत्तराखण्ड में वन सम्पत्ति और पेड़ों के कटान का बहुत अधिक चलन था और भारत सरकार ने भी वनों की रक्षा के लिए कोई सख़्त कानून नहीं बनाया था इसी कारण वन माफ़िया लकड़ियों का व्यापार करते थे और निर्दोष पेड़ों को काटते थे।
इसी समय सन 1970 में गौरा देवी के गाँव रैणी में 2400 देवदार वृक्षों को काटने के लिए चिन्हित किया गया इसलिए इस पर वन विभाग और ठेकेदार पेड़ों को काटने के लिए तैयार बैठे थे और उनकी सारी तैयारी पूरी हो चुकी थी और वो रैणी गाँव के जंगल में पहुँच चुके थे।
पर ये ख़बर जैसे ही गौरा देवी को पता लगी तो गौरा के
नेतृत्व में रैणी गाँव की 27 महिलाओं ने अपनी प्राणों की बाजी लगाकर पेड़ों की रक्षा करने का अभियान चलाया और गौरा अपने साथियों के संग पेड़ों पर चिपक गई और
उनके प्रयासों को असफल कर दिया इसी कारण गौरा देवी चिपको वूमन के नाम से जानी जाने लगी।
उनके इस कदम से पूरे उत्तराखण्ड राज़्य में चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई और बहुत से पर्यावरणविद जैसे चण्डी प्रसाद भट्ट, सुन्दरलाल बहुगुणा इसमें शामिल हुए।
गौरा देवी अपने जीवन काल में कभी विद्यालय नहीं जा सकीं, न ही वे पढ़ी लिखी थीं, लेकिन उनके भीतर पेड़ों के लिए जो प्रेम था वह उन्हें अपनी संस्कृति और सभ्यता से मिला और उनके इसी प्रेम की वजह से देश में वन अधिनियम 1972 लागू हुआ।
गौरा देवी का निधन 66 वर्ष की उम्र में 4 जुलाई 1991 में हुआ लेकिन आज भी उनके क्षेत्र में गौरा को याद किया जाता है और पर्यावरण दिवस 5 जून के दिन उनके क्षेत्र में उनके नाम पर ये दिन मनाया जाता है!
एक नजर चिपको आंदोलन की ओर -
चिपको आन्दोलन एक पर्यावरण-रक्षा का आन्दोलन है। यह भारत के उत्तराखण्ड राज्य (तब उत्तर प्रदेश का भाग) में किसानो ने वृक्षों की कटाई का विरोध करने के लिए किया था। वे राज्य के वन विभाग के ठेकेदारों द्वारा वनों की कटाई का विरोध कर रहे थे और उन पर अपना परम्परागत अधिकार जता रहे थे।
यह आन्दोलन तत्कालीन उत्तर प्रदेश के चमोली जिले में सन 1970 में प्रारम्भ हुआ। एक दशक के अन्दर यह पूरे उत्तराखण्ड क्षेत्र में फैल गया था। चिपको आन्दोलन की एक मुख्य बात थी कि इसमें स्त्रियों ने भारी संख्या में भाग लिया था। इस आन्दोलन की शुरुआत 1970 में भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा, कामरेड गोविन्द सिंह रावत, चण्डीप्रसाद भट्ट तथा श्रीमती गौरादेवी के नेत्रत्व मे हुई थी। यह भी कहा जाता है कि कामरेड गोविन्द सिंह रावत ही चिपको आन्दोलन के व्यावहारिक पक्ष थे, जब चिपको की मार व्यापक प्रतिबंधों के रूप में स्वयं चिपको की जन्मस्थली की घाटी पर पड़ी तब कामरेड गोविन्द सिंह रावत ने झपटो-छीनो आन्दोलन को दिशा प्रदान की।
By NAVEEN CHAND RAMOLA
गौरा देवी का जन्म 1924 में उत्तराखंड के लाता गाँव में हुआ था। इन्हें चिपको आन्दोलन की जननी माना जाता है।
गौरा की शादी मात्र 12 वर्ष की उम्र में मेहरबान सिंह के साथ कर दी गई थी, जो कि अलकनंदा नदी के किनारे बसे, उनके नज़दीकी गाँव रैणी के निवासी थे। मेहरबान सिंह एक किसान थे और भेड़ों को पालकर उनकी ऊन का व्यापार किया करता थे, इन्हीं छोटे-मोटे कामों से उनका घर चलता था!
लेकिन शादी के 10 वर्ष बाद ही मेहरबान सिंह की असमय मृत्यु हो गई और उसके बाद गौरा देवी को अपने बच्चे का लालन-पालन अकेले करना पड़ा और उन्हें काफी दिक्कतें आई लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी!
कुछ समय बाद गौरा देवी को रैणी गाँव की महिला मंडल दल का अध्यक्ष बनाया गया और गाँव के चारों और की वन और भू सम्पत्ति की देखभाल का जिम्मा उन्हें दिया गया, उस वक़्त गाँव के चारों ओर बड़े-बड़े पेड़-पौधे थे जो कि पूरे क्षेत्र को घेरे हुए थे और चारों तरफ हरियाली थी।
उस दौर में उत्तराखण्ड में वन सम्पत्ति और पेड़ों के कटान का बहुत अधिक चलन था और भारत सरकार ने भी वनों की रक्षा के लिए कोई सख़्त कानून नहीं बनाया था इसी कारण वन माफ़िया लकड़ियों का व्यापार करते थे और निर्दोष पेड़ों को काटते थे।
इसी समय सन 1970 में गौरा देवी के गाँव रैणी में 2400 देवदार वृक्षों को काटने के लिए चिन्हित किया गया इसलिए इस पर वन विभाग और ठेकेदार पेड़ों को काटने के लिए तैयार बैठे थे और उनकी सारी तैयारी पूरी हो चुकी थी और वो रैणी गाँव के जंगल में पहुँच चुके थे।
पर ये ख़बर जैसे ही गौरा देवी को पता लगी तो गौरा के
नेतृत्व में रैणी गाँव की 27 महिलाओं ने अपनी प्राणों की बाजी लगाकर पेड़ों की रक्षा करने का अभियान चलाया और गौरा अपने साथियों के संग पेड़ों पर चिपक गई और
उनके प्रयासों को असफल कर दिया इसी कारण गौरा देवी चिपको वूमन के नाम से जानी जाने लगी।
उनके इस कदम से पूरे उत्तराखण्ड राज़्य में चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई और बहुत से पर्यावरणविद जैसे चण्डी प्रसाद भट्ट, सुन्दरलाल बहुगुणा इसमें शामिल हुए।
गौरा देवी अपने जीवन काल में कभी विद्यालय नहीं जा सकीं, न ही वे पढ़ी लिखी थीं, लेकिन उनके भीतर पेड़ों के लिए जो प्रेम था वह उन्हें अपनी संस्कृति और सभ्यता से मिला और उनके इसी प्रेम की वजह से देश में वन अधिनियम 1972 लागू हुआ।
गौरा देवी का निधन 66 वर्ष की उम्र में 4 जुलाई 1991 में हुआ लेकिन आज भी उनके क्षेत्र में गौरा को याद किया जाता है और पर्यावरण दिवस 5 जून के दिन उनके क्षेत्र में उनके नाम पर ये दिन मनाया जाता है!
एक नजर चिपको आंदोलन की ओर -
चिपको आन्दोलन एक पर्यावरण-रक्षा का आन्दोलन है। यह भारत के उत्तराखण्ड राज्य (तब उत्तर प्रदेश का भाग) में किसानो ने वृक्षों की कटाई का विरोध करने के लिए किया था। वे राज्य के वन विभाग के ठेकेदारों द्वारा वनों की कटाई का विरोध कर रहे थे और उन पर अपना परम्परागत अधिकार जता रहे थे।
यह आन्दोलन तत्कालीन उत्तर प्रदेश के चमोली जिले में सन 1970 में प्रारम्भ हुआ। एक दशक के अन्दर यह पूरे उत्तराखण्ड क्षेत्र में फैल गया था। चिपको आन्दोलन की एक मुख्य बात थी कि इसमें स्त्रियों ने भारी संख्या में भाग लिया था। इस आन्दोलन की शुरुआत 1970 में भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा, कामरेड गोविन्द सिंह रावत, चण्डीप्रसाद भट्ट तथा श्रीमती गौरादेवी के नेत्रत्व मे हुई थी। यह भी कहा जाता है कि कामरेड गोविन्द सिंह रावत ही चिपको आन्दोलन के व्यावहारिक पक्ष थे, जब चिपको की मार व्यापक प्रतिबंधों के रूप में स्वयं चिपको की जन्मस्थली की घाटी पर पड़ी तब कामरेड गोविन्द सिंह रावत ने झपटो-छीनो आन्दोलन को दिशा प्रदान की।

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